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अपनी अलग अलग खिचड़ी

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दुनिया भर के लोग लॉकडाउन में कुछ ज्यादा ही आराम में व्यस्त हो गए हैं. कुछ तो दिन में रात की नींद और रात में दिन की पूरी कर रहे हैं.

कभी नहीं तुम काम करो…काम के बदले आराम करो…वाली प्रार्थना शायद सुन ली गई है. काल करे सो आज कर…इसलिए कल का आराम कर रहा हूँ…बीते कल का भी और आने वाले कल का भी.

इस दीर्घ कालीन अनचाहे अवकाश में उम्मीद थी कि किसी सरकारी दफ़्तर की फ़ाइल की तरह शादी की एल्बम नही मिलेगी पर क्या करूँ, पत्नी जी की निगाहें ए.सी.पी. प्रद्युम्न से भी ज्यादा तेज़ जो है. ढूढ़ कर सामने पेश कर ही दिया. अब उसे अच्छे दिन कह कर वह ताने भी मार रही है और विजयी मुस्कान के साथ साथ कोस भी रही है.

वह स्वयं के स्त्री होने का फर्ज़ निभा रही हैं…खुद को ही नही समझ पा रही है…पर मुझे कुछ पल अकेला छोड़ दे तो न्यूज़ चैनल वालों से साथ मिल कर आज जिन पिंग को और किम जोंग को खत्म कर के इतिहास रच दूँ. खैर, टी.वी. का चैनल बदलने का मौका ही नहीं मिला.

और इधर पत्नी साहिबा, सोशल मीडिया पर चतुरी चाची बनने के चक्कर में जो किचन की बैंड बज रही है उसका लाभ पड़ोस की सिन्धी वाली राशन की दुकान को हो रहा है. लगभग रोज़ ही मुझे ए.टी.एम. आंटी को नमस्ते बोलने जाना पड़ रहा है.

खैर, शाम तक कभी यह वाला तो कभी वह वाला व्यंजन…और इन सबमे में मेरे स्वर का तत्सम्-तद्भव हो रहा है.

खैर, अब उनका वजन तो ख़ुशी के मारे बढ़ रहा है, अब यह बोल दूँ तो उनकी जगह मेरी चर्बी उतार दी जाएगी.

फिर भी डरते-डरते मै यह कहने जा ही रहा था कि माँ सरस्वती ने वाक्य का वाकया ही बदल दिया. “लॉकडाउन के बाद तुम्हे नई ड्रेस दिलवा दूँगा”-मेरे मुँह से निकल पड़ा.

“वैसे तो इस लॉकडाउन में किसी ने छप्पन अंक का कोई ब्यौरा शायद नही बनाया किन्तु तुम्हे छप्पन नंबर की ड्रेस दिलवाऊंगा” – मै जारी रहा.

एक पल तो वह उदास हो गई पर अगले ही पल अपनी तरक्की पर इतराते हुए वह छप्पन भोज बनाने जाने लगी थी और मुझे छप्पन नंबर वाली ड्रेस, हाथ से फिसलती हुई, पिचत्तीस गुने दो वाली साइज़ की होती हुई महसूस हो रही थी.

किसी तरह पेट के दुरुस्त न होने के बहाने मैंने उनसे खिचड़ी की तारीफ़ करते हुए आज लंच में बनाने की विशेष फ़रमाईश की. प्रेशर कुकर की तरह मुँह फुलाने के कुछ पल बाद खिचड़ी के साथ बनने वाले चटनी, पापड़, चोखा आदि की तैयारी में लग गई.

मै छप्पन भोग के खर्चे से बचने की ख़ुशी में था और वह अपनी पाक कला के सोशल मीडिया में प्रदर्शन की प्रस्तावित ख़ुशी में मगन थी.

अपनी अलग-अलग खिचड़ी पकाने में हम दोनों को ही आत्मिक ख़ुशी हो रही थी.

Writer: Satyendra Kumar Singh

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