Home Aap ki Kalam “माँ”

“माँ”

नैनों का दर्पण देखों,
आँखों से ओझल सपने,
दे दिए तुझको सारे ,
नैनों के जुगनू अपने।

ख्वाहिशों की बंजर धरती,
तेरे सिवा कुछ नहीं चाहती है।
प्यार की परछाई ये,
रुकावटों की एक नहीं मानती है।
बस एक तेरी खुशियों के ही,
बीज सारे बोती है।

कोशिशों की चाल ये,
रुकना नहीं जानती है।
मुश्किलों के इस समंदर में,
तेरा कौन माँझी,
बस एक तेरी रूह ,
दूजा तेरी माँ तुझे पहचानती है।

ज़िन्दगी की रंगत सारी,
यारों की संगत -यारी,
दुनिया की दुनियादारी,
परखा सबको बारी-बारी,
कोई तुझसा पाया नहीं ।
पास जो तू न हो,
साथ मेरे मेरा साया नहीं।

आंगन की तुलसी मेरे,
घर की ये चौखट मेरी,
मंदिर के भगवन मेरे,
जागते हैं जगने से तेरे।

तेरी उंगली पकड़ के माँ,
बस चलते जाना है।
बाकी जहाँ ये,
सारा अनजाना है,
माँ …जहाँ ये अनजाना है।
        
        

©प्रिंसी मिश्रा

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