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‘बेकार है’

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जो जहां से है, वहीं जाएगा
तुम्हारी उसपर पहरेदारी बेकार है।

तुम पकड़कर रोक लोगे उसका हाथ मगर,
उसके ज़ेहन के पीछे भागना बेकार है।

गुनाह के बाद गुनाह हर बार करता है,
खुदा से मग़फ़िरत करना तेरे लिए बेकार है।

वो साक़ी होके भी होश की बात करता है,
तेरा होश में रहना बेकार है।

तू उठ और बदल दे, अपना वक़्त,
अब वक़्त का इन्तिज़ार करना बेकार है।

वो दूर होकर भी इस क़दर याद आता है,
तेरा क़रीब में रहना बेकार है।

लेखिका – तैबा हबीब

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