Home Aap ki Kalam “आईना”

“आईना”

हमें अब न आईना न अक्स अपना लगता है,
जाने क्यों भटकता हर शख्स अपना लगता है।

खामोश होकर भी चीख़ती हैं कुछ रातें,
अब तो चारों ओर बस शोर अपना लगता है।

हमें तो न रास्ते न मंज़िल की कोई आस है,
साथ चलता अब बस कारवाँ अपना लगता है।

क्या ख़ूब ही कहा था किसी ने ‘याद रक्खोगे’,
अब तो ख्वाबों का आशियां अपना लगता है।

लौटने का न कोई अब वायदा हो तो बेहतर है,
अब आँखों से गिरा मोती तक न अपना लगता है।

गद्दार हो गए सभी जज़्बात जो कभी हमारे थे,
अब न गम न खुशी पर इख्तियार अपना लगता है।

घर तो छोड़ा पर कदमों से न रास्ता भूला गया,
लौटते हैं तो फिर से वो घर-बार अपना लगता है।

रूह से बिछड़ा हुआ सा जिस्म मानो लौटता हो,
भरते हर ज़ख्म का दर्द अब तो अपना लगता है।

एक पल ही सही हम अपनों में तो लौटे आखिर,
अधूरा और ‘बागी’ जागते ही अंजाम अपना लगता है।

लेखिका -प्रिंसी मिश्रा©

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here