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दाढ़ी का तिनका

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हुआ कुछ यूँ कि मुल्ला जी को प्याज़ खरीदते देखा तो सवाल निकल पड़ा कि इस बार प्याज़ कुछ ज्यादा नहीं खरीद रहे आप? मुस्कराते हुए मुल्ला जी अपनी दाढ़ी खुजाते हुए बोले – “भाईसाहब, इस बार लॉकडाउन में प्याज़ सौ रुपए में छह-सात किलो तो आराम से मिल रही है तो खरीद लिया जाए. वैसे भी मटन आदि तो मिल नही रहा तो कटहल दो-प्याज़ा से ही काम चल रहा है”

अब घर में रहते-रहते हमने भी दाढ़ी बनाने की जहमत नही उठाई तो हमारी दाढ़ी भी बढ़ गई थी. नई दुल्हन सरीखा प्यार उमड़ रहा था उसके लिए. प्यार से उसे सहलाते हुए हमारे मुँह से निकल पड़ा – “ठीक है भाईजान, पर चुनाव के वक्त प्याज़ की इस कीमत को ध्यान में रखिएगा…और अगर हो सके तो इस ईद पर हमें भी कटहल का कोरमा और कटहल बिरयानी की दावत पेश करिएगा”
हम दोनों की बातें सुनते हुए शायद सब्जी वाला बोर हो रहा था. जल्दी से पैसे पकड़ ठेला लेकर निकल पड़ा. थोड़ा दिमाग पर जोर डाला तो ध्यान आया कि उसकी भी दाढ़ी थी…कुछ विराट कोहली जैसी.

अब घर आ कर जो बैठा तो दाढ़ी के इर्द-गिर्द मेरी सोच घूमने लगी. महाभारत के भीष्म से लेकर ऋषियों तक, राजाओं से लेकर सिख भाइयों तक, बाएं हाथ के अधिकांश कलमकारों से लेकर हाज़ी भाईयों तक…सबके तो दाढ़ी है…तो फिर दाढ़ी का उचित सम्मान न मिलना, हम सब की तहज़ीब में कुछ अज़ीब सा प्रतीत हो रहा था.

एक समय तो चिकनी सूरत वाले आमिर खान पर गाना बनता था तो अब बगैर दाढ़ी के कोई हीरो ही नही बन सकता…और हो भी क्यों न?
सटासट दाढ़ी के रेजर वाली रणनीति ने न जाने कितनी भारतीय ब्लेड कंपनियों की हज़ामत बना दी. उस पर शेविंग लोशन, शेविंग क्रीम आदि को बेचने के विज्ञापन से कितनी बालाओं को मॉडल बनने का मौका मिला और इन ग्लैमर गर्ल्स पर कटाक्ष वाली चर्चा में न जाने कितनी महिलाओं की शाम यूँ ही गुज़र जाती थी…वो बात अलग है कि पतिदेव लोग भी इन विज्ञापनों पर अपनी पैनी नज़र बनाए रखते थे.
अब लोग ख़ुद की हज़ामत बनाते हुए दिखने लगे तो ईंटा-लियन सलून का भी धंधा मंदा होने लगा. फ़िर नया दौर आया और ईंट का ज़वाब पत्थर (पार्लर) से दिए जाने की तैयारी शुरू हुई.

हीरो और मॉडल्स की दाढ़ी में इन्वेस्टमेंट शुरू हुआ. लोगों ने इनके प्रति अपनी श्रध्दा कुछ ऐसी दिखाई कि क्लीन-शेव्ड दुल्हे तक आउट-ऑफ़-डिमांड होने लगे…अब दाढ़ी ख़ुद से सेट करना इतना आसान न रहा और गली-गली में महिलाओं के पार्लर से ज्यादा तो पुरुषों के पार्लर शुरू हो गए…यूनिसेक्स पार्लर में तो ज्यादा ही भीड़ होने लगी.
खैर, इन सबके बीच अब दाढ़ी गुले-गुलज़ार होने लगी है पर इसका अब धर्म-जाति से कोई विशेष नाता नहीं रह गया है.

पर पता नही क्यों तिनके खोजने की आदत गई नहीं हमारी. अब यह तिनका दाढ़ी वालों व बगैर दाढ़ी वालों में घुस गया है.. शको-सुबह का यह तिनका पड़ी लकड़ी से ज्यादा खतरनाक हो गया है और ऐसा घुस गया है कि मॉब-लिंचिंग के वक्त नफ़रत के सैलाब में डूबने वाले को बचने के लिए अब इस तिनके का सहारा नही बचा है. अब तिनके का भी कोई धर्म-ईमान नही रह गया है. जय हो!
खैर, दाढ़ी बढ़ाते जाईए और उस पर दाढ़ी वाली क्रीम की मालिश करते जाईए..दाढ़ी वालों की जय हो न हो किन्तु तिनके ढूढ़ने वाली सोच की पराजय अवश्य होनी चाहिए.
©️सत्येन्द्र सिंह

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