Home Aap ki Kalam ‘उधार’ के सिन्दूर

‘उधार’ के सिन्दूर

एक चुटकी सिंदूर की कीमत तुम क्या जानो आदित्य बाबू


कॉलेज में लगभग बीस साल बाद आदित्य और सुमन कैंटीन की आखिरी बेंच पर बैठे थे. न फ़ोन से और न ही चिट्ठी से कोई संपर्क था. दोनों की मुहब्बत की कसमें सब खाते थे. फिर अचानक सुमन के माता पिता उसे ले कर कही चले गए. पड़ोसियों से पूछने पर भी कुछ पता न चला. उदास आदित्य भी आगे की पढाई करने शहर चला गया.


फेसबुक पर अचानक दोनों ने एक दुसरे को देखा. इस बार भी शुरुआत आदित्य ने ही की. बातों बातों में मुलाक़ात का वक़्त मुक़रर कर लिया दोनों ने. सकुचाते हुए दोनों कैंटीन में पहुंचे. कैंटीन वाले मामाजी के चेहरे पे झुर्रियां साफ़ दिख रही थी पर गर्मजोशी में कोई कमी नही थी. आते हे उन्होंने दोनों को आशीर्वाद दिया और मेज़ साफ़ करवा के चाय भेज दी.
सुमन ने थोडा मुस्कुराते हुए पुछा कि अब भी तुम उतने ही शर्मीले हो या मुझे देख कर बोलती बंद हो गई है? आदित्य ने चहरे के भावों को सँभालते हुए सुमन का हाथ पकड़ा और लाल आँखों से पूछा-“तुम मुझे छोड़कर क्यों चले गए, वो भी बिना बताये? तुम्हे पता है कि मैं कितना परेशान हो गया था? कम से कम बता के तो जाते.”

सुमन के आँसू छलक गए

सुमन ने आदित्य के चेहरे पे हाथ फेरते हुए कहा-“पिताजी को हमारे प्यार के बारे में पता चल गया था. जात बिरादारी का वास्ता दे कर वो राज़ी नहीं थे. फिर अचानक उनकी तबियत बहुत ख़राब हो गयी और हमे फ़ौरन ही एम्स ले जाना पड़ा. किसी को इसलिए नहीं बताया कि कारण क्या बताते?” बोलते-२ सुमन के आँसू छलक गए और आदित्य बेचैन सा हो गया.
आदित्य ने फिर उसके परिवार के बारे में पूछा तो सुमन ने बताया कि पिताजी तो एम्स में ही चल बसे किन्तु उनके दिए कसम की वजह से वो आदित्य से मिल न सकी. माँ ने दूर के रिश्तेदार से कह कर एक रिश्ता तलाश कर शादी करवा दिया. दो साल बाद पति का एक दुर्घटना में देहांत हो गया. शायद सुमन के बेवफाई की सजा मिल गए थी उसे.


आदित्य ने बताया की उसके ऊपर किसी प्रकार का कोई दबाव नहीं था इसलिए उसने इंतज़ार करना ही उचित समझा. जब उदास होता तो सुमन को तलाश करता, कुछ बडबडाता और अपने काम से मन बहलाता. उसने तो केवल सुमन को ही अपनी जीवन संगिनी माना था और उसे अकेले ही निभाता गया.
सुमन ने जैसे ही यह सब सुना, आदित्य के गले लग कर फूट-२ कर रोने लगी. आदित्य की भी आंखे नम होती चली गई. कैंटीन वाले मामाजी की भी आंखे छलक उठी. काफी समय के बाद जब दोनों के ग़म बह चुके तो सामने कैंटीन का छोटू गरम चाय ले कर खड़ा था. सुमन ने उसे चाकलेट दिया और मुस्कुराते हुए चला गया.


फिर अचानक ही आदित्य ने सुमन का हाथ पकड़ा और प्यार का स्पर्श दिया. जेब से सिन्दूर की डिबिया निकाली और हक के साथ सुमन की मांग में भर दिया और इससे पहले सुमन कुछ समझ पाती, आदित्य उसे लेकर मामाजी के पास गया. सुमन ने बरबस आदित्य के साथ मामाजी के पैर छुए और मामाजी काफी समय तक दोनों के सिर पर हाथ फेरते रहे और मौन आशिर्वाद देते रहे.
आज सुमन, आदित्य के बीस साल के ‘उधार’ के सिन्दूर के बंधन में बंध चुकी थी.

राइटर: सत्येंद्र सिंह

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